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| पीपीपी से सावधान |
| पीपीपी यानी पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप न सीधा निजीकरण है न पूंजीवाद और न ही साम्राज्यवाद. इसका चेहरा जनता के प्रति हिमायती दिखता है और ये दावा करता है, जनता की खुशहाली का. इसका वाहक है एनजीओ, जो पूंजी की ताकतों का चहेता भी है, जो एक तरह से पूंजीवादी को मजबूत करने वाला एक दलाल होता है,जो असल में समाजवाद की भाषा बोलकर उसका ही दुश्मन होता है. - योगेश दीवान का विश्लेषण |
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| बिल गेट्स की कैसी सेवा |
| बिल गेट्स ने माइक्रोसॉफ्ट की दैनिक जवाबदारियों से मुक्ति पा ली है और अब वे अपने फाउंडेशन के माध्यम से दुनिया की सेवा कर रहे हैं. पूंजीवादी विचारकों का कहना है कि पूंजीवाद को अपनी पूंजी का एक हिस्सा गरीब दुनिया को गरीबी व बीमारी से मुक्त कराने के लिए खर्च करना चाहिए. इसे वे रिसन अर्थव्यवस्था का नाम देते हैं. क्या है इस अर्थव्यवस्था का सच - समाजवादी विचारक रघु ठाकुर का विश्लेषण |
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| भूखी जनता भाड़ में जाये |
| इससे अधिक निराशाजनक कुछ नहीं हो सकता कि स्वतंत्रता के 63 साल के बाद भी सोनिया गांधी नीत राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने देश की भूखी जनता का पेट भरने से हाथ खड़े कर दिए हैं. एक ऐसे देश में जहां विश्व की सबसे अधिक आबादी भुखमरी का शिकार है और जहां कुल बच्चों की आधी संख्या कुपोषित है, वहां सरकार का बहुत सीधा सा फरमान है- भूखे को भूखे ही रहना होगा. - खाद्य और कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा का विश्लेषण |
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| कैसे सुलझे कश्मीर |
| कश्मीर में जारी विवाद का कोई अंत नजर नहीं आ रहा है. हमारे सशस्त्र बल, विशेषकर सीआरपीएफ समस्या को बढ़ा ही रहे हैं. दुर्भाग्यवश, कश्मीर समस्या को आज भी केवल कानून और व्यवस्था की समस्या माना जा रहा है. आमजनों की महत्वाकांक्षाओं, उनके सपनों व उनकी समस्याओं पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है. हमारे सशस्त्र बल लगातार मानवाधिकारों हनन कर रहे हैं. - डॉ. असगर अली इंजीनियर का विश्लेषण |
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| मुक्ति की बाट जोहते कतकरी |
| हमारे कथित सभ्य समाज और कानून ने मिलजुल कर कतकरी और अपराध को जैसे एक दूसरे का पर्यायवाची बना दिया है. कहीं चोरी हो जाये तो पुलिस के लिये सबसे सरल है किसी कतकरी को पकड़ना. कुछ समय पहले खेत के कुएं का पानी चोरी हो गया तो कतकरी जमात के चार लड़कों को गांववालों ने जमकर मारा-पीटा, उन्हें पेड़ों से बांधा और उनके गुप्तांगों को मिर्च-मसाले से भर दिया. - रायगढ़ और थाणे से लौटकर शिरीष खरे की रिपोर्ट |
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| हिमालय में खुलता एक मोर्चा |
| हिमाचल के किन्नौर में खनन और मॉक डंपिंग का काम धड़ल्ले से अनियमित व अवैज्ञानिक ढंग से जारी है, जिसके खिलाफ लोग गोलबंद हो रहे हैं. पारंपरिक रूप से शांत रहने वाला समाज अब भीतर से खदबदा रहा है. आंतरिक सुरक्षा के मसले पर मध्य भारत में अपने ही लोगों से लड़ रही सरकार के लिए यह एक और खुलता हुआ मोर्चा है, जिसे नजरअंदाज करना कहीं ज्यादा मुश्किल है. - किन्नौर, हिमाचल प्रदेश से लौटकर अभिषेक श्रीवास्तव की रिपोर्ट |
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| गुड़ाखू के गुलाम |
| गुड़िया जैसी 3 साल की इस नन्ही परी का नाम टमी है, जिसकी उंगली में गुड़ाखू लगा है और वह उस से दांत घिस रही है. कालाहांडी के नियमगिरि पहाड़ में बसे गांव लाखपदर में जब मैंने उसे घर के बाहर खड़े होकर गुड़ाखू करते देखा तो सोचा, जरुर यह बच्ची गलती से गुड़ाखू कर रही होगी. मैंने उसकी मां को आवाज़ लगाई. मां का जवाब था- नहीं, वह गुड़ाखू ही कर रही है. - कालाहांडी, ओडिशा से पुरुषोत्तम सिंह ठाकुर की रिपोर्ट |
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| दीना का प्रेमवन |
| रीवा के एक छोटे से गांव में रहने वाले कोल आदिवासी दीनानाथ को लगा कि सभी लोग पेड़ काट रहे हैं, कुछ लोग तो ऐसे हों, जो पेड़ लगायें. इसी सोच को साकार करने के लिये उन्होंने एक पूरा जंगल खड़ा कर दिया. रोली शिवहरे और प्रशान्त दुबे की रिपोर्ट |
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| कश्मीरीयत की वापसी |
| पिछले दिनों हजारों कश्मीरी पंडित माता खीर भवानी के दर्शनों के लिए पहुंचे. कश्मीर के खीर मंदिर में जुटी पंडितों और मुसलमानों की भीड़, कश्मीरियत के पुनर्जीवित होने की प्रक्रिया की शुरूआत कही जा सकती है. राम पुनियानी का आलेख |
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| नग्नता, नंगापन और मिस्टर सिंह मिसेज मेहता |
| मिस्टर सिंह मिसेज मेहता के निर्देशक प्रवेश भारद्वाज का कहना है कि विवाहेतर संबंधों की कहानी कहने में एक अजीब-सी ज़िम्मेदारी सिर पड़ जाती है कि कहीं आप विवाहेतर संबंधों की वकालत तो नहीं कर रहे हैं. खास रविवार के लिये प्रवेश भारद्वाज का आलेख |
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| इस सर्वे से सावधान |
| दिल्ली में इन दिनों मुस्लिम धर्म गुरुओं से एक भयावह सवालों से भरा सर्वे किया जा रहा है. सवाल ऐसे हैं, जिनके निष्कर्ष पहले से तय हैं. - दिल्ली से अजय प्रकाश की रिपोर्ट |
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| पद्मश्री लौटाना चाहता है चरणदास |
| गरीबी और बीमारी ने उन्हें तोड़ दिया. पद्मश्री समेत सारे सम्मान बेमानी साबित हुये और आज हालत ये है कि अपनी दवाइयां खरीदने और गृहस्थी की गाड़ी चलाने के चक्कर में वे लाख रुपये के कर्जे में डूबे हुए हैं. राजनांदगांव, छत्तीसगढ़ से अतुल श्रीवास्तव की रिपोर्ट |
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| पीपीपी से सावधान |
| पीपीपी यानी पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप न सीधा निजीकरण है न पूंजीवाद और न ही साम्राज्यवाद. इसका चेहरा जनता के प्रति हिमायती दिखता है और ये दावा करता है, जनता की खुशहाली का. इसका वाहक है एनजीओ, जो पूंजी की ताकतों का चहेता भी है, जो एक तरह से पूंजीवादी को मजबूत करने वाला एक दलाल होता है,जो असल में समाजवाद की भाषा बोलकर उसका ही दुश्मन होता है. - योगेश दीवान का विश्लेषण |
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| बिल गेट्स की कैसी सेवा |
| बिल गेट्स ने माइक्रोसॉफ्ट की दैनिक जवाबदारियों से मुक्ति पा ली है और अब वे अपने फाउंडेशन के माध्यम से दुनिया की सेवा कर रहे हैं. पूंजीवादी विचारकों का कहना है कि पूंजीवाद को अपनी पूंजी का एक हिस्सा गरीब दुनिया को गरीबी व बीमारी से मुक्त कराने के लिए खर्च करना चाहिए. इसे वे रिसन अर्थव्यवस्था का नाम देते हैं. क्या है इस अर्थव्यवस्था का सच - समाजवादी विचारक रघु ठाकुर का विश्लेषण |
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| भूखी जनता भाड़ में जाये |
| इससे अधिक निराशाजनक कुछ नहीं हो सकता कि स्वतंत्रता के 63 साल के बाद भी सोनिया गांधी नीत राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने देश की भूखी जनता का पेट भरने से हाथ खड़े कर दिए हैं. एक ऐसे देश में जहां विश्व की सबसे अधिक आबादी भुखमरी का शिकार है और जहां कुल बच्चों की आधी संख्या कुपोषित है, वहां सरकार का बहुत सीधा सा फरमान है- भूखे को भूखे ही रहना होगा. - खाद्य और कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा का विश्लेषण |
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| असलियत |
| सदाशिव चेतन अखबार पढ़ते हुए एक अपील पर अटके लेकिन उस अपील ने सदाशिव चेतन की असलियत को सामने खड़ा कर दिया. राहुल राजेश की कहानी. - |
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| रणेन्द्र |
| रणेन्द्र की इस कविता में विद्रोह भी है और करुणा भी. लेकिन निरपेक्ष या तटस्थ होने की तरह नहीं. एक बदलाव की उम्मीद की तरह. |
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| मनोज शर्मा | जम्मू |
| जीवन के झंझावात को बहुत आहिस्ते से उकेरने वाली इन कविताओं में मनोज शर्मा का कवि एक नये अर्थ-संभावनाओं के साथ नज़र आता है. |
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| रिबाऊन्ड |
| कुछ दुख ऐसे होते हैं, जो शाश्वत होते हुए भी जब पहली बार महसूस होते हैं तो नये लगते हैं. मां-बेटी के द्वंद्व से कहीं अधिक मनुष्य के रिश्ते को उधेड़ती पुष्पा तिवारी की कहानी |
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| स्वामी अग्निवेश |
| माओवादियों से बातचीत ही एकमात्र रास्ता है |
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| एम जे अकबर |
| गुजरात में मुठभेड़ का सच |
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| प्रीतीश नंदी |
| सब पर प्रतिबंध |
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| डॉ. सुभाष राय |
| अमरीका का दोगलापन |
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| Updated: 899 minutes ago |